भारत में पसमांदा मुसलमानः संख्या, संघर्ष और राजनीति की दिशा

भारत में मुस्लिम समाज को अक्सर एक समान इकाई के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। इस समाज के भीतर भी गहरी सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ मौजूद हैं। इन्हीं में एक बड़ा वर्ग है- पसमांदा मुसलमान, जिसका अर्थ है “पीछे छूटे हुए” या “हाशिए पर पड़े” लोग।

पसमांदा समाज का प्रतिशतः एक अनुमानित तस्वीर

भारत में मुसलमानों की कुल आबादी लगभग 14-15% के आसपास है। इस मुस्लिम आबादी के भीतर पसमांदा वर्ग की हिस्सेदारी को लेकर कोई आधिकारिक सरकारी आँकड़ा नहीं है, लेकिन विभिन्न सामाजिक अध्ययनों और शोधों के अनुसार, यह अनुमान लगाया जाता है कि मुस्लिम समुदाय के लगभग 70% से 85% लोग पसमांदा वर्ग से आते हैं।

इसमें वे जातियाँ और समुदाय शामिल हैं जो सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं-जैसे अंसारी, कुंजड़ा, मनिहार, धुनिया, नट आदि।
: राजनीति में ऐतिहासिक उपेक्षा

भारतीय राजनीति में पसमांदा मुसलमान लंबे समय तक हाशिए पर रहे। मुस्लिम नेतृत्व पर प्रायः अशराफ (उच्च वर्गीय मुसलमान) का वर्चस्व रहा, जिससे पसमांदा समाज की आवाज़ कमजोर पड़ी।

चाहे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हो या क्षेत्रीय दल-अधिकांश ने मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट मानकर देखा, लेकिन उसके भीतर की विविधता को नजरअंदाज किया।

नई राजनीति में उभरती पहचान

पिछले कुछ वर्षों में पसमांदा राजनीति ने नई पहचान बनानी शुरू की है। अली अनवर अंसारी जैसे नेताओं ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। उन्होंने यह तर्क दिया कि सामाजिक न्याय की लड़ाई धर्म के भीतर भी उतनी ही जरूरी है जितनी धर्मों के बीच।

हाल के समय में नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने भी पसमांदा समाज को राजनीतिक रूप से साधने की कोशिश की है। “सबका साथ, सबका विकास” के नारे के साथ पसमांदभविष्य की भूमिकाः निर्णायक शक्ति बन सकती है?

आने वाले समय में पसमांदा समाज भारतीय राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं:

संख्या बलः यदि यह वर्ग राजनीतिक रूप से संगठित होता है, तो यह चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।

सामाजिक न्याय का मुद्दाः मंडल राजनीति के बाद अब मुस्लिम समाज के भीतर भी सामाजिक न्याय की मांग तेज हो रही है।

राजनीतिक दलों की नई रणनीतिः सभी प्रमुख दल अब पसमांदा वर्ग को अलग पहचान देकर साधने की कोशिश कर रहे हैं। चुनौतियाँ भी कम नहीं

हालांकि, इस उभरती राजनीति के सामने कई चुनौतियाँ हैं-आंतरिक विभाजन, नेतृत्व की कमी और मुख्यधारा की राजनीति में सीमित प्रतिनिधित्व। इसके अलावा, यह भी देखना होगा कि क्या पसमांदा मुद्दा केवल चुनावी रणनीति बनकर रह जाएगा या वास्तव में सामाजिक बदलाव का माध्यम बनेगा।
[ निष्कर्ष

पसमांदा मुसलमानों का सवाल केवल एक समुदाय का नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र में समानता और न्याय की परीक्षा है। यदि यह वर्ग अपनी राजनीतिक चेतना को संगठित कर पाता है, तो यह भारतीय राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। अब यह समय बताएगा कि पसमांदा समाज केवल एक “वोट बैंक” बना रहता है या अपनी शर्तों पर राजनीति को प्रभावित करने वाली शक्ति बनता है।…

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